Bangladesh Father Of nation Bangabandhu Sheikh Mujibur Rahman Assassination – जब बांग्लादेश के राष्ट्रपिता की हत्या से सन्न रह गई थी दुनिया, दो बेटियों को छोड़ सभी को उतार दिया था मौत के घाट

आज बात बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की, जिनकी हत्या से पूरी दुनिया सहम उठी थी। हत्या के पीछे कुछ जूनियर सैन्य अफसरों का हाथ था, जिन्होंने रहमान के परिवार के सदस्यों को बेरहमी से 15 अगस्त 1975 को मार डाला था। रहमान की दोनों बेटियां उस वक्त जर्मनी में थी, इसलिए उनकी जान बच गई थी। हालांकि, हत्या के बाद उन्हें देश वापस लौटने से रोक दिया गया था। यह बेटियां कोई और नहीं बल्कि शेख हसीना और शेख रेहाना थी।

बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या 1975 के तख्तापलट का हिस्सा थी। दरअसल, साल 1971 में पकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश रहमान के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था। रहमान, कमान संभालते ही देश को हर क्षेत्र में आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हो गए। लेकिन कुछ महीनों में ही रहमान ने सत्ता के कई स्वरूपों में बदलाव किये। स्थानीय स्तर पर चुनाव नहीं हुए, जिससे उनके प्रति नाराजगी बढ़ गई।

कुछ समय बाद शेख मुजीबुर रहमान सरकार पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगे और दबे हुए शब्दों में उन्हें तानाशाह कहा जाने लगा। चार साल बीतते-बीतते मुजीबुर रहमान के लिए गुस्सा चरम पर था, जिनमें कुछ सैन्य अफसर भी शामिल थे। फिर 15 अगस्त 1975 को जो हुआ वह इतिहास में दर्ज हो गया। बांग्लादेशी सेना के कुछ जूनियर सैन्य अफसरों ने मुजीबुर के घर को घेर लिया और ताबड़तोड़ गोलियां दागी गईं, जिनमें मुजीबुर रहमान के परिवार के लोगों की जान चली गई।

इस हमले में रहमान के अलावा उनकी बीवी, बेटे, बहू और 10 साल के बच्चे को मार डाला गया। रहमान की दोनों बेटियां शेख हसीना (बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री) और शेख रेहाना, घटना के वक्त जर्मनी गई हुई थी। इस हत्याकांड के बाद शेख हसीना और रेहाना को वतन वापसी से रोक दिया गया। रहमान की हत्या के बाद सालों तक हिसक झड़पें जारी रही और 1977 में फिर से तख्तापलट हुआ, जिसके बाद जनरल जिया उर रहमान ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया था।

हालांकि, शेख मुजीबुर रहमान की बेटी ने हार नहीं मानी और अपने पिता की विरासत के सालों तक राजनीतिक लड़ाई लड़ी। ब्रिटेन में रहकर उन्होंने बांग्लादेश में अपना एक अलग स्तर स्थापित किया। इस दौरान शेख हसीना को भी लगातार जनता का समर्थन मिला। शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद हालात उलट चुके थे लेकिन साल 1981 में वह बांग्लादेश लौटीं और सर्वसम्मति से अवामी लीग की अध्यक्ष चुन ली गईं। फिर 1996 में पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी।



Reference-www.jansatta.com

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